hindi poem of (हरिवंशराय बच्चन),(सूर्यकांत त्रपाठी निराला)

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Hindi mein poem :- (आप किसके साथ हो)

में हूँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
कभी नहीं जो तज सकते है
अपना न्यायोचित अधिकार
कभी नहीं जो सह सकते है
शीश नवाकर अत्याचार
एक अकेले हो या उनके
साथ खड़ी हो भारी भीड़
में हूँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़ hindi poem
निर्भय होकर घोषित करते
जो अपने उदगार विचार
जिनकी जिव्हा पर होता है
उनके अंतर का अंगार
नहीं जिन्हे चुप कर सकती है
आतातियों की शमशीर
में हूँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

baby poem in Hindi:-

नहीं झुका करते जो दुनिया से
करने को समझौता
ऊचे से ऊंचे सपनो को
देते रहते जो न्योता
दूर देखती जिनकी पैनी
आँख भविष्यत का तम चीर
में हूँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
जो अपने कंधो पर्वतो से
बढ़ टकर लेते है
पथ की बाधाओं को जिनके
पाव चुनौति देते है
जिनको बांध नहीं सकती है
लोहे की बड़ी जंजीर
में हूँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

download:-

जो चलते है अपने छप्पर के
ऊपर लुका धरकर
हार जित का सौदा करते
जो जान की बाजी पर
कूद उदधि में नहीं पलटकर
जो फिर ताका करते तीर
में हूँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
जिनको यह अवकाश नहीं है
देखे कब तारे अनुकूल
जिनको यह परवाह नहीं है
कब तक भद्रा कब दिर्कशूल
जिनके हाथो की चाबुक से
चलती है उनकी तक़दीर
में हूँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
तुम हो कौन कहो जो मुझसे
सही गलत पथ लो तो जान
सोच सोचकर पूछ पूछकर
बोलो कब चलता तूफान
सत्पथ है वह जिस पर अपनी
छाती ताने जाते वीर
में हूँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

(हरिवंशराय बच्चन)

hindi poem of (हरिवंशराय बच्चन),(सूर्यकांत त्रपाठी निराला)

new Hindi poem:-(वह तोड़ती पत्थर )

वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने इलहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार
शाम तन भर बांध यौवन
गुरु हथौड़ा हाथ
करती बार बार प्रवाह
सामने तरु मालिका अट्टालिका प्राकार

चढ़ रही थी धुप
गर्मियों के दिन
दिवा का तात्म्याता रूप
उठी झुलसाती हुई लू
रुई जुयो जलाती हुई भू
गर्द चंगी छा गई

पर्याय हुई दुपहर
वह तोड़ती पत्थर

देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की और देखा छीन तार
देखकर कोई नहीं
देखा मुझे उस द्र्ष्टि से

जो मार खा रोइ नहीं
सजा सहज सितार
सुनी मैने वह नहीं जो थी सुनी झंकार
एक छन के बाद वह कॉपी सुधर
दुलक माथे से गिरे सीकर
लीन होते कर्म में फिर ज्यो कहा
में तोड़ती पत्थर
(सूर्यकांत त्रपाठी निराला )

दोस्तों आप लोगो को हमारी यह hindi poem किसी लोगी हमें कमेंट करके जरूर बताना की आप को हमारी इन सभी hindi poem  में से कौन सी सबसे ज्यादा अच्छी लोगी प्लीज हमें आप ऐसे ही अपना पियर और सपोर्ट देते रहना क्युकी हमको आपके सपोर्ट से मोटिवेशन मिलता है चलिए फिर मिलेंगे और भी दूसरी hindi poem के साथ जब तक के लिए आप सभी को हमारी तरफ से thankyou for your सपोर्ट
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